संस्कार #लघुकथा /सतीशराज पुष्करणा

गली की नुक्कड़ पर दो आदमी खड़े गरमा-गरम बहस कर रहे थे । दोनों एक दूसरे को जान से मार देने पर उतारू थे । 
उसने छोटे भाई से संबोधित संबोधित होते हुए कहा- ” क्यो बे, भूल गया तू ? जब तेरे बड़े भाई ने तुझे मार कर सड़क पर फेंक दिया था, तो मैंने ही अपना ख़ून देकर तेरी जान बचायी थी । और आज तू उसी के लिए मुझे….।”
” क्यों नहीं ! हम दोनों भाइयों का ख़ून एक है और जो ख़ून तूने दिया था – वह यही बोल रहा है ।”

सतीशराज पुष्करणा
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